बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में जब अंग्रेजों की हकुमत थी। तब जमीदारी का दौर था।गांव ,देहात वा कस्बों में उन्ही की हकूमत चलती थी।गांव देहात में किसान और इस कॉम का आपसी रिश्ता बहुत गहरा था।क्योंकि खेती बाड़ी के सभी औजार इस कॉम के लोग बना कर देते थे। इसके बदले किसान छह माह में अनाज देते थे।कभी कभी फसल खराब हो गई तो वह भी नही मिलता था। जिससे इस कॉम की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी।बहुत से किसान वा जमीदारों का व्यवहार
इस कॉम के प्रति बहुत खराब होता था। ये लोग इस कॉम का आर्थिक वा मानसिक शोषण भी करते थे।
उस वक्त हर तबके की पहचान बिना सर नेम के अधूरी समझी जाती थी।इसलिए इस कॉम को लुहार , बढ़ई, वा नज्जार के नाम से पुकारा जाता था।
जब इस कॉम में पढ़ा लिखा तबका सामने आया तो उसने अपने पुस्तैनी काम से हटकर , डाक्टर,इंजीनियर, वकील, वा सरकारी नौकरियों की तरफ रुख करना शुरू कर दिया।
परंतु दूसरी कॉम के लोग इस कॉम के लोगो को हिकारत की नजर से देखने लगे।इसलिए तालीम याफ्ता तबका अपने आपको शेख, सैय्यद ,खान, कादरी,वारसी बता कर छिपाने लगा।
इस कमी को दूर करने के लिए कॉम के जिम्मेदार लोगो में जागरूकता पैदा हुई। कि हमारी कॉम की भी अपनी कोई पहचान होनी चाहिए।
इसके लिए लोगो ने पूरे मुल्क में जगह जगह मीटिंग करनी शुरू कर दी और इस कॉम के लोगो को जागरूक करना शुरू कर दिया। सभी जिम्मेदार लोगो ने कोई ऐसा सरनेम खोजने के प्रयास शुरू कर दिए ।जिससे हमारी कॉम अपना सिर ऊंचा करके अपनी पहचान बताने में फख्र महसूस करे। दूसरी कॉम के लोगो ने अपने सरनेम खोज लिए थे।जैसे अंसारी, कुरेशी,मंसूरी, सलमानी, इदरीसी वा अलवी आदि।
इस काम के लिए जिम्मेदार लोगो ने मेरठ ,मुजफ्फर नगर अमरोहा, अलीगढ़, गुलावठी, स्याना आदि स्थानों पर तंजीमे बना कर कार्य करना शुरू कर दिया।
सबसे पहले सन 1937 में जनाब महिनुर्रहमान और हाजी अब्दुल हफीज के वालिद जनाब अब्दुल करीम ने मेरठ में इस तबके को जागरूक किया
सन 1945 में जनाब पीरजादा और अमीर बक्स ने अलीगढ़, मुहम्मद अजीज ने स्याना और जनाब मोइनुद्दीन ने फत्तेहपुर संभल में मुहिम चला कर सरनेम खोजने की कोशिश की।
आजादी के बाद ऐसी कोशिशें फिर शुरू हुई।सत्तार के दशक में हाजी अली शेर ने गुलावठी ( बुलंदशहर) में इसका सिलसिला चलाया। जिसे डा, मेहरुद्दीन निवासी बढ़पुरा(दादरी) ने काफी आगे बढ़ाया। डा,मेहरुद्दीन ने 12 जनवरी 1975 को दादरी में बैठक करके ” सैफी” लफ्ज को सरनेम के लिए पेश किया मगर वहां पर उसको अंतिम रूप नही दिया जा सका।( जनाब अली हसन चाकन वाला की किताब के अनुसार) मगर वही “सैफी” सरनेम अमरोहा की सरजमी पर आयोजित सम्मेलन में 6 अप्रैल 1975 को कॉम की पहचान बना।
सैफ के मायने तलवार होता है।और सैफी का मतलब तलवार बनाने वाला।
सैफी सरनेम की अंग्रेजी में इस्प्रकार व्याख्या की गई।
S…….Super
A…… Artisan
I…….. Industrialist
F……. Federetion
I…….. India
अर्थात
Super Artisan Industrialist Federetion of India
सैफी सरनेम को खोजने वाले महा पुरषों के नाम निम्न लिखित है।
1= मौलाना मुहम्मद उस्मान फरक लीक (पिलखुआ)
2=मौलाना नजीरुल अकरम नईमी (मुरादाबाद)
3= डा,मेहरुद्दीन खां (दादरी)
4= जनाब बाबू हनीफ बछरायूं
5= जनाबअलीहसन चकनवाला
6= हाजी अली शेर सैफी (गुलावठी)
7= जनाब मुहम्मद यूसुफ सैफी। गुलावठी
8 = जनाब सुलेमान साबिर सैफी
9= जनाब मुल्ला सईद पहलवान ( अमरोहा)
10= जनाब सेठ मुहम्मद सद्दीक
11= जनाब गुलाम मुहम्मद जिलानी (मेरठ)
12= मुहम्मद किफायतुल्ला सैफी
(मेरठ)
13= अब्दुल हफीज सैफी
14= कामरेड हकीमुल्ला
15= अब्दुल बहाव सैफी
16= एडवोकेट मुख्तार सैफी (मुरादाबाद)
17= मास्टर मुहम्मद अली सैफी
(समाना वाले)
18= जनाब नजीर अहमद (मामन बुलंद शहर)
19= मुहम्मद वकील सैफी दिल्ली
20= जनाब रशीद सैदपुरी
सबसे पहले सैफी सरनेम के बैनर तले “ऑल इण्डिया सैफी जमायते सैफिया” नामक तंजीम का गठन किया गया।जिसने सैफी सरनेम को देश के कोने कोने में पहुंचने में अहम रोल अदा किया।इसके अलावा कई तंजीमें वजूद में आई जिन्होंने सैफी बरादरी की फलाह बेहदूदी के लिए अनेक काम किए।मगर जिन बुजुर्गो ने सैफी सरनेम खोजा था ।उनको उचित सम्मान नही दे सकी।जिसके लिए वे सभी बुजुर्ग हकदार थे।
यह दर्द जमीनी सोच के मालिक
जनाब मुहम्मद जबीब सैफी संभली को काफी दिन से खटक रहा था। पिछले वर्ष अप्रैल 2021 में जनाब जबीव भाई ने “सैफियों के सुनहरे पचास साल” नामक ग्रुप का गठन किया ।जिसमे लगभग 200 लोगो को जोड़ा गया।और 2024 में सैफी सरनेम देने वाले बुजुर्गो को उचित सम्मान देने के लिए ” ऑल इण्डिया सैफी राब्ता कमेटी” नामक संगठन खड़ा किया।
9 दिसंबर 1973 को दादरी के पास एक गांव बम्बा बढ़ में एक पंचायत हुई।जिसमे जनाब अब्दुल सत्तार को अध्यक्ष डा, मेहरुद्दीन खां को महा सचिव और अब्दुल हमीद को खजांची बनाया गया।
सन 1974 में मेरठ शहर में हाजी अब्दुल हफीज और मुहम्मद किफायतुल्ला ने अपने और साथियों के साथ मिलकर ” ऑल इंडिया ब्लैक स्मिथ एंड कारपेंटर ऑर्गेनाइजेशन” नामक तंजीम का गठन किया।
इसी तरह मई 1974 में नज्जरान वा अहगरान तंजीमो का गठन किया गया।जिनको डा,मेहरुद्दीन खां वा अन्य साथियों ने रजिस्टर्ड कराया। इसमें बाबू हनीफ बछरायूं और सुलेमान साबिर भी भाग लेने लगे।
12 जनवरी 1975 को दादरी नगर पालिका में उपरोक्त तंजीमों की पहली मीटिंग हुई।इस मीटिंग में यह तय हुआ कि आगामी 19 जनवरी को दिल्ली ,हरियाणा उत्तर प्रदेश के नुमाइंदों को बुला कर एक बड़ा जलसा किया जाय।
हालांकि इस मीटिंग में डा, मेहरुद्दीन खां ने कुछ नाम पेश किए जैसे अजमी, सिद्दकी, दाऊदी ,सैफी, नूही, आइन गर आदि।मगर किसी एक नाम पर कोई राय नहीं बन सकी।
19 जनवरी को दादरी में फिर एक बड़ा जलसा किया गया।जिसमे ग्रह राज्य मंत्री श्री एफ. एच . मोहसिन ने शिरकत की।इस जलसे की अध्यक्षता जनाब बशीर अहमद वा संचालन जनाब सुलेमान साबिर ने किया।इस जलसे में यह तय हुआ कि सभी तंजीमे मिलकर सरनेम तलाश करें।कोई एक तंजीम सरनेम की पेशकश ना करे।
31 मार्च 1975 को कस्बा गुलावठी ( बुलंदशहर) में बरादरी का एक सम्मेलन हुआ।जिसकी सदारत जनाब सुलेमान साबिर ने की।इस सम्मेलन में डा, मेहरुद्दीन खां,हाजी अली शेर ,मोहम्मद युसूफ , मुल्ला सईद पहलवान अमरोहा, बाबू हनीफ बछरायूं, वा रसीद सैदपुरी,ने विशेष रूप से भाग लिया।और उसमे इन लोगो ने कई नाम पेश किए। मगर बाद में सबकी एक राय बनी कि 6 अप्रैल 1975 को अमरोहा की सरजमी पर होने वाले महा सम्मेलन में शनाख्ती सरनेम तय कर लिया जाएगा।
खैर 6 अप्रैल 1975 बा रोज इतवार अमरोहा की सरजमी पर एक महा सम्मेलन आयोजित किया गया।जिसका आयोजन जनाब मुल्ला सईद पहलवान ने किया।इसमें लाखो लोगो ने भाग लिया।इसके लिए मुल्ला सईद पहलवान ने बहुत मेहनत की थी।
सम्मेलन के सदर इंडो पाक के मशहूर पत्रकार हजरत मौलाना मुहम्मद मौलाना उस्मान फार्क लीक वा मौलाना नजीरूल अकरम नईमी( मुरादाबाद) की नजामत ने हमारा प्यारा सरनेम
“सैफी” की घोषणा की गई।वहां उपाथित लाखों लोगो ने इसके लिए लब्बैक कहा।